Sunday, June 23, 2019

कुल एनपीए की क़रीब 50 फीसदी राशि 100 बड़े क़र्ज़दारों के पास

आरटीआई के तहत प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक शीर्ष 100 एनपीए क़र्ज़दारों का एनपीए 4,46,158 करोड़ रुपये है, जो कि देश में कुल एनपीए 10,09,286 करोड़ रुपये का क़रीब 50 फीसदी है. rbi kolkata reuters
रिजर्व बैंक. (फोटो: रॉयटर्स)


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नई दिल्ली: एनपीए घोषित किए गए टॉप 100 खातों का एनपीए राशि करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपये है. खास बात ये है कि ये राशि कुल एनपीए का करीब 50 फीसदी है. द वायर द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार आवेदन में इसका खुलासा हुआ है.

भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया कि 31 दिसंबर 2018 तक टॉप 100 एनपीए कर्जदारों का कुल एनपीए 4,46,158 करोड़ रुपये था. इसका मतलब है कि इनमें से हर एक खाते की औसतन 4,461 करोड़ रुपये की राशि एनपीए (गैर निष्पादित परिसंपत्तियां यानी बैंकों का फंसा हुआ क़र्ज़) घोषित की गई है. हालांकि आरबीआई ने इन 100 खातों की जानकारी देने से मना कर दिया.


पांच फरवरी 2019 को तत्कालीन वित्त मंत्री द्वारा राज्यसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंको (शेड्यूल्ड कॉमर्शियल बैंक) का कुल एनपीए 31 दिसंबर 2018 तक 10,09,286 करोड़ रुपये था. इसमें से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल एनपीए 8,64,433 करोड़ रुपये था.
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इस हिसाब से कुल एनपीए का करीब 44 फीसदी हिस्सा सिर्फ 100 खातों में है. वहीं, अगर सार्वजनिक बैंकों से इसकी तुलना करें तो कुल एनपीए का करीब 52 फीसदी राशि इन 100 खातों में है. मार्च 2019 तक कुल लोन का करीब 9.3 फीसदी हिस्सा एनपीए था.
बीते 26 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई द्वारा बैंक डिफॉल्टर्स की जानकारी नहीं देने को लेकर दायर एक अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्रीय बैंक को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि आरबीआई अपने पारदर्शिता नियमों में बदलाव करे और इस प्रकार की जानकारी जनता को मुहैया कराए.
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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि रिजर्व बैंक के पास ये आखिरी मौका है, अगर इसके बाद भी जानकारी नहीं दी जाती है तो फिर अवमानना कार्रवाई की जाएगी. कोर्ट का ये आदेश उसके दिसंबर 2015 के आदेश की पुष्टि थी, जिसमें आरटीआई के तहत ऐसी सभी जानकारी देने के लिए कहा गया था.
हालांकि द वायर द्वारा दायर किए गए आरटीआई के तहत आरबीआई ने टॉप 100 एनपीए खातों की विस्तृत जानकारी जैसे कि खातों की राशि, खाताधारक के नाम, ब्याज राशि इत्यादि देने से देने से मना कर दिया. आरबीआई का कहना है कि उनके पास ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं है.
आरबीआई ने बताया कि वो बैंकिंग रेगुलेशन (बीआर) एक्ट 1949 की धारा 27(2) और आरबीआई एक्ट 1934 की धारा 28 के तहत ऋण से संबंधित जानकारी इकट्ठा करता है. जवाब के मुताबिक, ‘बीआर एक्ट की धारा 28 के तहत आरबीआई सिर्फ एक्ट की धारा 27 (2) के तहत इकट्ठा की गई जानकारी को ही दे सकता है, वो भी जिस तरीके से उसे ठीक लगे.’
केंद्रीय बैंक ने कहा कि आरबीआई एक्ट की धारा 45(ई) के तहत कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर बाकी अन्य मामलों में आरबीआई को ऋण संबंधी जानकारी देने से मना किया गया है.
हाल ही में दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खासतौर से कहा था कि आरबीआई को बैंकों के वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट और कारण बताओ नोटिस से संबंधित जानकारी देनी होगी. हालांकि इस संदर्भ में भी आरबीआई ने आदेश का उल्लंघन करते हुए गैरकानूनी तरीके से जवाब देने से मना कर दिया.
आरबीआई ने कहा, ‘जो जानकारी मांगी गई है उसे इकट्ठा करने में संस्थान के काफी संसाधन खर्च होंगे. इसलिए ये जानकारी आरटीआई एक्ट की धारा 7(9) के तहत नहीं दी जा सकती है.’
हालांकि आरटीआई एक्ट की इस धारा के आधार पर जानकारी देने से मना नहीं किया जा सकता है. धारा 7(9) कहती है कि अगर मांगी गई जानकारी उस प्रारूप में नहीं है जिस प्रारूप में आवेदक ने मांगी है तो जनसूचना अधिकारी उस रूप में ये जानकारी मुहैया कराए, जिस रूप में वो मौजूद है.
बैंक डिफॉल्टर्स से संबंधित जानकारी मांगने पर आरबीआई ने कहा, ‘इस मामले में अभी जांच चल रही है.’ हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि ये जानकारी दी जानी चाहिए.
रिजर्व बैंक अपनी पारदर्शिता नीति को लेकर हमेशा से ही सवालों के घेरे में है. आरबीआई ने आज तक सुप्रीम कोर्ट के साल 2015 के फैसले को लागू नहीं किया है, जिसमें बैंक डिफॉल्टर्स, निरीक्षण रिपोर्ट जैसी जानकारी देने के लिए कहा गया था.
पिछले साल 20 नवंबर को रिटायर हुए केंद्रीय सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलु ने पत्र लिखकर मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर से गुजारिश की थी कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को आरबीआई द्वारा जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले लोगों (विलफुल डिफॉल्टर्स) की जानकारी नहीं देने के लिए सख्त कदम उठाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 के फैसले में आरबीआई की सभी दलीलों को खारिज करते हुए विलफुल डिफॉल्टर्स पर सीआईसी के 11 आदेशों को सही ठहराया था.
श्रीधर आचार्युलु ने इस बात को लेकर खतरा बताया है कि अगर आरबीआई पारदर्शिता के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करता रहा तो ये गोपनीयता के वित्तीय शासन में तब्दील हो जाएगा. इसकी वजह से वित्तीय घोटाले होंगे और घोटालेबाज आसानी से देश छोड़कर भाग सकेंगे, जैसा कि हाल के दिनों में हुआ है.--The Wire



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